शनिवार, 31 जनवरी 2015

tanu thadani तनु थदानी मैं बस छटपटा गया

पाया सुकून ख्वाहिशों को , जो घटा गया !
खुशहाल हुआ ज्यों ही अपना ,मैं हटा गया !

दूरी  नहीं  मिटी , मिटायी  लाख  लकीरें  ,
लफ्जों का वो कबाड़ी,जाने क्या चटा गया !

मैं  गिन रहा था जोड़ जोड़, गल्तियां उसकी ,
आया,गले मिल कर के वो,सब कुछ घटा गया !

था प्रश्न, बनना क्या है? तो , मैंने कहा बच्चा ,
 कह तो दिया , न होगा , मैं बस छटपटा गया !

शुक्रवार, 30 जनवरी 2015

tanu thadani तनु थदानी एक मजहब बनाते हैं

एक मजहब बनाते हैं , एक ईश्वर बनाते हैं !
हमें हैं बेचने कट्टे , चलो सबको लड़ाते हैं !

मुझे बेवकूफ तुझको बोलने का,अब नहीं मतलब,
लड़ाता मैं हूँ फिर भी फैसले , मुझसे कराते हैं !

तुम्हारी धर्म पुस्तक में , जो खंजर घूमता रहता ,
उसी की धार पे खूं के निशां ,सबको डराते हैं !

किसी मासूम की आंखों में ना,आंसू कभी आये ,
चलो मजहब को तेरे मोड़ , खिलौना बनाते हैं !







गुरुवार, 22 जनवरी 2015

tanu thadani तनु थदानी मुझे तुम नास्तिक कह लो

कहीं  सवाल  के  उत्तर में , पत्थर बाज बनते हैं !
यही तो प्रश्न है कि , क्यूँ हम पत्थर बाज बनते हैं ?

हजारों गज जमीं जो  गांव में थी , छोड़ छाड़ कर,
यहाँ सौ गज के घर में रह, तरक्की बाज बनते हैं !

वो मां ने जान के चालाकियां ,फिर भी दिये कंगन,
मगर  समझे  नहीं  बेटे , यूं  चालबाज  बनते हैं !

गजब थी भीड, फाटक बंद था , थी रेल आने को ,
निकाला खुद को नीचे से , बड़े जांबाज  बनते हैं !

हमारे  पास  मौके  खूब  आते , इंसा  होने  के ,
मगर हम आदतन, खुद से ही ,धोखेबाज बनते हैं !

फरिश्ते  देख  कर  भागे , हमारे हाल धरती के ,
कि  ईश्वर पालने के भी  यहाँ , रिवाज बनते हैं !

हम ही बस श्रेष्ठ हैं , सारी लड़ाई का यही मुद्दा ,
धरम की देह पे नाहक ही, खुजली खाज बनते हैं !

कभी मिलना हो मुझसे तो,धरम को छोड़ के मिलना ,
धरम को  ओढ़ने  वाले  ही , पंगेबाज  बनते  हैं !

मुझे तुम नास्तिक कह लो,मगर ये तो बताओ,क्यूँ,
धरम  से युद्ध  व  जेहाद  के , अल्फाज बनते हैं ??




गुरुवार, 15 जनवरी 2015

tanu thadani तनु थदानी अरी सखी

एक्खट - दुक्खट लील गया,ये शहर कमीना !
अरी सखी ,न आना,कठिन है  यहाँ पे जीना !

चश्मे  काले  भीतर  आंखे , बदन  टटोले ,
घर भीतर भी हम आराम से, रहें कभी ना !

तोहरे गाँव मा अबहूं  , काका भईया हैं ना ?
शहर ने बीच चौराहे, इ सब रिश्ता छीना !


पेट की खातिर शर्म बिके,तुम समझ रही हो ?
यही शहर की बातें हमको , कभी जमी ना !
             -------------------  तनु थदानी